नोटबंदी के बाद भाजपा और कांग्रेस के लिए 26 वार्डों में हुए ये नगर निगम चुनाव उनके प्रदर्शन को आंकने की एक बड़ी कसौटी थे. निर्दलीय 67 उम्मीदवारों सहित कुल 122 उम्मीदवार चुनाव में खड़े हुए थे. वहीं 2,37,374 महिलाओं सहित कुल 5,07,627 मतदाता थे.बेशक, यूपी विधानसभा चुनावों से पहले यह जीत बीजेपी के लिए हौंसला बढ़ाने का काम करेगी.
महाराष्ट्र में 3727 में 893 सीटों पर जीती थी बीजेपी
इससे पहले महाराष्ट्र में हुए नगर निकाय चुनावों में बीजेपी ने 3727 सीटों में से 893 सीटों पर जीत हासिल की थी. नोटबंदी का विरोध करने वाली शिवसेना ने 529 सीटें जीती हैं. बीजेपी ने अपना प्रदर्शन एक तरह से तीन गुना से ज़्यादा बेहतर किया है. 2011 के चुनाव में उसे 298 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार 893 सीटें मिली हैं. वहीं शिवसेना ने 2011 के 264 सीटों के मुक़ाबले 529 सीटें जीतकर प्रदर्शन दोगुना बेहतर किया है. कांग्रेस के पास पिछले चुनाव में 771 सीटें थीं, जो घटकर 727 रह गई हैं. एनसीपी के पास 2011 में 916 सीटें थीं, जो घटकर 615 रह गई हैं. इस तरह से देखेंगे तो सबसे अधिक नुकसान एनसीपी को हुआ है और सबसे अधिक फायदा बीजेपी को हुआ है. अगर नोटबंदी कारण है, तो शिवसेना ने भी तो नोटबंदी का विरोध किया है, फिर भी उसकी सीटें डबल हो गईं.
गुजरात में भी बीजेपी को 126 में से 109 सीटें मिली थीं
27 नवंबर को गुजरात में भी स्थानीय निकायों के उपचुनाव हुए थे. यहां बीजेपी ने 126 में से 109 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को सिर्फ 17 सीटें मिलीं. पहले यहां बीजेपी के पास 64 सीटें थीं और कांग्रेस के पास 52 सीटें थीं. इन चुनावों में हार जीत का लोकसभा या विधानसभा के चुनावों पर भले न फर्क पड़ता हो, लेकिन पार्टी के भावी नेता तो यहीं से पैदा होते हैं. कांग्रेस की हालत बताती है कि गुजरात में उसके भीतर नेता बनाने की क्षमता समाप्त हो चुकी है. वापी नगरपालिका उपचुनावों की 44 सीटों में से बीजेपी को 41 सीटें मिली हैं. कांग्रेस को सिर्फ तीन. वैसे यहां हमेशा से बीजेपी का दबदबा रहा है. सूरत-कनकपुर-कंसाड नगरपालिका चुनाव में 28 सीटों में से बीजेपी ने 27 सीटों पर जीत हासिल कीं. कांग्रेस ने सिर्फ़ एक सीट हासिल की. राजकोट में गोंडल तहसील पंचायत के चुनाव में बीजेपी ने 22 में से 18 सीटें हासिल कीं


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