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दिल्ली में 2008 में धमाके हुए थे. उसी दौरान एक 12 साल के बच्चे ने इस सीरियल ब्लास्ट में लोगों को बचाया था. बदले में सरकार ने उसकी बहादुरी के बदले एक घर देने का वादा किया था. मगर आज भी वह शख्स और उसका परिवार फुटपाथ पर सोता है.
साल 2008, तारीख 13 सितंबर. ये वही तारीख है जिस दिन दिल्ली धमाकों से दहल उठी थी. मगर उसी सीरियल ब्लास्ट में 12 साल के एक लड़के ने कई लोगों की जान बचाई थी. इस बच्चे का नाम राहुल चव्हाण था. राहुल उस समय सड़कों पर गुब्बारे बेचने का काम करता था. इसके बाद तो जैसे राहुल के सम्मान में सरकार ने उसके आगे फूल बिछा दिए. राहुल को 2008 में वीरता पुरस्कार भी मिला. आपको बता दें कि बच्चे की बहादुरी के लिए मिलने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार वीरता ही होता है.
राहुल को दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार ने पुरस्कार, घर, अच्छी शिक्षा और नौकरी देने का वायदा भी कर दिया लेकिन मिला कुछ भी नहीं. अब राहुल पूरे परिवार के साथ दिल्ली के किसी भी इलाके के फुटपाथ पर सोता है. 2009 में राहुल ने उपराष्ट्रपति को अपने हाथों से बनाई घर की तस्वीर भेंट की थी.
राहुल का कहना है, "हां हम ऐसे ही फुटपाथ पर सोते हैं. कोई उठा देता है तो कहीं और चले जाते हैं. मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा था कि 18 साल के हो जाओगे तो नौकरी देंगे. वहीं घर देने का भी वादा किया था. मगर आज तक कुछ नहीं मिला."
राहुल मूल रुप से महाराष्ट्र के रहने वाले हैं मगर दिल्ली में ही उनका परिवार का कोई सदस्य सड़कों पर खिलौने बेचता है तो कोई शख्स सड़कों पर गुब्बारे बेचने का काम करता है. राहुल के नाना ने ही उसे बचपन से पाला है. मगर अब वो अधिकारियों के घर के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं. अब उन्हें भी कोई उम्मीद नहीं कि उनके बेटे को घर मिलेगा.
राहुल के नाना का कहना है, "हम सभी के पास गए मगर किसी ने कोई मदद नहीं की, कोई भी सरकार आई हो नई सरकार ने भी कोई मदद नहीं की."
तो फिक्र किसे है. अब महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक, राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार तक सत्ता बदल चुकी है. मगर आज भी ये शख्स उसी हालात में जिंदगी गुजारने को मजबूर है

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